पियाजे, पावलव, थार्नडाइक और कोहलर – रचना एवं आलोचनात्मक स्वरूप Piaget Pavlov Thorndike and Kohler: Constructs and Critical Perspectives

Piaget Pavlov Thorndike and Kohler: Constructs and Critical Perspectives: एमपी टीईटी वर्ग 3 (MPTET Varg 3) परीक्षा और एक शिक्षक के दैनिक विद्यालयीन कार्यों के लिए बाल मनोविज्ञान के प्रमुख विचारकों—जीन पियाजे, इवान पावलव, ई.एल. थार्नडाइक और वोल्फगैंग कोहलर (Piaget Pavlov Thorndike and Kohler: Constructs and Critical Perspectives) —का अध्ययन अत्यंत महत्वपूर्ण है। इन मनोवैज्ञानिकों ने यह स्पष्ट किया है कि बच्चे कैसे सीखते हैं, उनकी बुद्धि का विकास कैसे होता है, और व्यवहार में परिवर्तन कैसे लाया जा सकता है।

आगामी परीक्षा की तैयारी और एक आदर्श शिक्षक के रूप में आपकी कक्षा-कक्ष रणनीतियों (Classroom Strategies) को मजबूत करने के लिए यह आलेख तैयार किया गया है। इसमें प्रत्येक विचारक के सिद्धांत (रचना), उनके शैक्षिक निहितार्थ, और उनके सिद्धांतों की आलोचना (Critical Perspective) को विस्तार से समझाया गया है।

📚 बाल विकास एवं शिक्षाशास्त्र (CDP) – MPTET Varg 3

अध्याय: पियाजे, पावलव, थार्नडाइक और कोहलर – रचना एवं आलोचनात्मक स्वरूप

(Piaget, Pavlov, Thorndike, and Kohler: Constructs and Critical Perspectives)

1. जीन पियाजे का संज्ञानात्मक विकास का सिद्धांत (Jean Piaget’s Theory of Cognitive Development)

स्विट्जरलैंड के मनोवैज्ञानिक जीन पियाजे को ‘विकासात्मक मनोविज्ञान का जनक’ (Father of Developmental Psychology) कहा जाता है। पियाजे का मानना था कि बच्चे ‘नन्हे वैज्ञानिक’ (Little Scientists) होते हैं जो दुनिया के बारे में अपनी समझ (ज्ञान) का निर्माण स्वयं करते हैं। इस दृष्टिकोण को संज्ञानात्मक रचनावाद (Cognitive Constructivism) कहा जाता है।

A. पियाजे के सिद्धांत की मुख्य रचना (Core Constructs)

पियाजे ने सीखने की प्रक्रिया को समझाने के लिए कुछ महत्वपूर्ण पदों (Terms) का प्रयोग किया:

  • स्कीमा (Schema): यह सूचनाओं और ज्ञान को व्यवस्थित करने का एक मानसिक ढांचा (Mental structure) है। सरल शब्दों में, यह बच्चे के दिमाग में बनी किसी वस्तु या विचार की ‘फाइल’ है।
  • अनुकूलन (Adaptation): वातावरण के अनुसार खुद को ढालने की जन्मजात प्रवृत्ति। इसके दो भाग हैं:
    • समावेशन / आत्मसातीकरण (Assimilation): पूर्व ज्ञान (पुराने स्कीमा) में नई जानकारी को ज्यों का त्यों जोड़ लेना। (जैसे- एक सफेद कुत्ते को जानने वाला बच्चा पहली बार सफेद बिल्ली को देखकर उसे भी ‘कुत्ता’ ही कहता है)।
    • समायोजन (Accommodation): नई जानकारी के आधार पर पुरानी सोच (स्कीमा) में बदलाव या संशोधन करना। (जब बच्चा समझ जाता है कि बिल्ली भौंकती नहीं म्याऊं करती है, तो वह कुत्ते और बिल्ली के लिए अलग-अलग स्कीमा बना लेता है)।
  • संतुलन (Equilibration): समावेशन और समायोजन के बीच तालमेल बिठाने की प्रक्रिया।

B. पियाजे की विकास की 4 अवस्थाएँ (4 Stages of Development)

  1. संवेदी-गामक अवस्था (Sensory-Motor Stage – 0 से 2 वर्ष): बच्चा अपनी इंद्रियों (आँख, कान, हाथ) से सीखता है। ‘वस्तु स्थायित्व’ (Object Permanence) का गुण विकसित होता है।
  2. पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था (Pre-operational Stage – 2 से 7 वर्ष): बच्चा प्रतीकों (Symbols) का प्रयोग करता है। इसमें जीववाद (Animism – निर्जीव को सजीव समझना) और अहंकेंद्रिता (Egocentrism – केवल अपना दृष्टिकोण सही मानना) पाई जाती है।
  3. मूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Concrete Operational Stage – 7 से 11 वर्ष): प्राथमिक कक्षा (वर्ग 3) के बच्चे इसी में आते हैं। तार्किक चिंतन (Logical thinking) शुरू होता है, लेकिन केवल ‘मूर्त’ (सामने रखी) वस्तुओं के लिए। बच्चा संरक्षण (Conservation), वर्गीकरण और पलटावी (Reversibility) का गुण सीख जाता है।
  4. अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था (Formal Operational Stage – 11 से 15 वर्ष): किशोर बिना देखे भी (अमूर्त रूप से) समस्याओं पर तर्क कर सकते हैं। निगमात्मक तर्क (Deductive reasoning) का विकास।

C. कक्षा-कक्ष में व्यावहारिक उपयोग (Educational Implications)

  • दैनिक शिक्षण में: शिक्षक को बच्चों को स्वयं करके सीखने (Learning by doing) के अवसर देने चाहिए। प्राथमिक स्तर (मूर्त अवस्था) पर गणित या विज्ञान पढ़ाते समय हमेशा वास्तविक और ठोस वस्तुओं (जैसे- कंकड़, तीलियां, मॉडल) का प्रयोग करें।
  • शिक्षक को ‘ज्ञान देने वाले’ के बजाय एक ‘सुविधादाता’ (Facilitator) की भूमिका निभानी चाहिए।

D. आलोचनात्मक स्वरूप (Critical Perspective)

  • सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों की उपेक्षा: लेव वाइगोत्स्की ने पियाजे की आलोचना की कि उन्होंने बच्चे के विकास में समाज, संस्कृति और भाषा के महत्व को नकार दिया।
  • अवस्थाओं की कठोरता: पियाजे ने कहा कि विकास क्रमिक अवस्थाओं में होता है, लेकिन आधुनिक शोध बताते हैं कि यदि बच्चे को अच्छा वातावरण/प्रशिक्षण मिले तो वह अपनी उम्र से पहले भी जटिल कार्य सीख सकता है।
  • कमतर आंकना: पियाजे ने पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था के बच्चों की क्षमताओं (जैसे दूसरों का दृष्टिकोण समझना) को बहुत कम आंका था।

2. इवान पावलव का शास्त्रीय अनुबंधन सिद्धांत (Ivan Pavlov’s Classical Conditioning)

रूसी शरीर विज्ञानी इवान पावलव को 1904 में पाचन क्रिया पर शोध के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था। उनका सिद्धांत उद्दीपक-अनुक्रिया (Stimulus-Response या S-R) पर आधारित है, जो बताता है कि आदतें कैसे बनती हैं।

A. पावलव के सिद्धांत की रचना (Core Constructs)

पावलव ने एक भूखे कुत्ते पर प्रयोग किया।

  • स्वाभाविक उद्दीपक (Unconditioned Stimulus – UCS): भोजन, जिसे देखकर स्वाभाविक अनुक्रिया (लार आना) होती है।
  • अस्वाभाविक / कृत्रिम उद्दीपक (Conditioned Stimulus – CS): घंटी की आवाज़। शुरुआत में घंटी से लार नहीं आती।
  • अनुबंधन (Conditioning): जब बार-बार ‘घंटी’ के तुरंत बाद ‘भोजन’ दिया गया, तो कुत्ते ने घंटी की आवाज़ को भोजन के साथ जोड़ लिया। अंततः, केवल ‘घंटी’ (CS) बजने पर ही कुत्ते के मुँह से लार (CR – Conditioned Response) आने लगी। यही शास्त्रीय अनुबंधन है।

B. कक्षा-कक्ष में व्यावहारिक उपयोग (Educational Implications)

  • आदतों का निर्माण: सुबह स्कूल की घंटी बजते ही बच्चों का प्रार्थना के लिए लाइन में लग जाना शास्त्रीय अनुबंधन का ही उदाहरण है।
  • भय या फोबिया दूर करना: यदि कोई बच्चा गणित या किसी सख्त शिक्षक से डरता है, तो शिक्षक अपने मित्रवत व्यवहार (अच्छे उद्दीपक) के साथ उस विषय को जोड़कर बच्चे का डर (Conditioned Fear) दूर कर सकता है (वि-अनुबंधन / Deconditioning)।
  • भाषा सीखना: बच्चों को A फॉर Apple सिखाना—जहाँ ‘Apple’ की तस्वीर (स्वाभाविक) के साथ ‘A’ अक्षर (कृत्रिम) को जोड़ा जाता है।

C. आलोचनात्मक स्वरूप (Critical Perspective)

  • यांत्रिक और निष्क्रिय दृष्टिकोण (Mechanistic & Passive): पावलव का सिद्धांत मानव को एक मशीन मानता है जो उद्दीपक मिलने पर स्वचालित रूप से प्रतिक्रिया करता है। यह बच्चे की अपनी बुद्धि, तर्क और रचनात्मकता (Creativity) को पूरी तरह से नजरअंदाज करता है।
  • पशुओं तक सीमित: जो नियम एक कुत्ते पर लागू होते हैं, वे जटिल मानव मस्तिष्क और उच्च-स्तरीय चिंतन (Higher-order thinking) पर पूरी तरह से लागू नहीं किए जा सकते।
  • अस्थायित्व: यदि घंटी बजने के बाद लंबे समय तक भोजन न दिया जाए, तो लार आना बंद हो जाता है (विलोपन / Extinction)। इसी तरह, इस विधि से रटा हुआ ज्ञान स्थायी नहीं होता।

3. ई. एल. थार्नडाइक का प्रयास एवं त्रुटि का सिद्धांत (E.L. Thorndike’s Trial and Error Theory)

एडवर्ड ली थार्नडाइक को ‘शिक्षा मनोविज्ञान का प्रथम जनक’ (First Educational Psychologist) माना जाता है। उनका सिद्धांत संबंधवाद (Connectionism) भी कहलाता है।

A. थार्नडाइक के सिद्धांत की रचना (Core Constructs)

थार्नडाइक ने एक भूखी बिल्ली को एक पिंजरे (Puzzle Box) में बंद कर दिया, जिसका दरवाज़ा एक लीवर (Letch) दबने से खुलता था। बाहर भोजन (मछली) रखा था।

बिल्ली ने बाहर निकलने के लिए कई यादृच्छिक (Random) प्रयास किए—उछल-कूद की, पंजे मारे। अचानक उसका पैर लीवर पर पड़ा और दरवाज़ा खुल गया। बार-बार यही दोहराने पर बिल्ली की ‘त्रुटियां’ (Errors) कम होती गईं और अंत में वह बिना किसी फालतू प्रयास के सीधा लीवर दबाना सीख गई।

B. सीखने के मुख्य नियम (Primary Laws of Learning)

थार्नडाइक ने सीखने के 3 मुख्य नियम दिए, जो हर शिक्षक के लिए ‘ब्रह्मास्त्र’ हैं:

  1. तत्परता का नियम (Law of Readiness): बच्चा तभी सीख सकता है जब वह शारीरिक और मानसिक रूप से सीखने के लिए तैयार हो। (आप घोड़े को पानी तक ले जा सकते हैं, पर उसे पीने के लिए मजबूर नहीं कर सकते)।
  2. अभ्यास का नियम (Law of Exercise): “करत-करत अभ्यास ते, जड़मति होत सुजान।” किसी क्रिया को बार-बार दोहराने से उद्दीपक-अनुक्रिया (S-R) का बंधन मजबूत होता है (उपयोग का नियम), और न दोहराने पर कमज़ोर हो जाता है (अनुपयोग का नियम)।
  3. प्रभाव का नियम (Law of Effect / संतोष-असंतोष का नियम): यदि किसी कार्य का परिणाम सुखद (Reward) होता है, तो बच्चा उसे दोहराता है। यदि परिणाम दुखद (Punishment) होता है, तो वह उसे छोड़ देता है।

C. कक्षा-कक्ष में व्यावहारिक उपयोग (Educational Implications)

  • प्रस्तावना (Introduction): ‘तत्परता के नियम’ का उपयोग करते हुए, शिक्षक को नया पाठ शुरू करने से पहले बच्चों का पूर्व ज्ञान जांचकर उन्हें मानसिक रूप से तैयार (Motivate) करना चाहिए।
  • पुनरावृत्ति (Revision): ‘अभ्यास के नियम’ के तहत शिक्षक को गणित, व्याकरण और कविता याद कराने के लिए पर्याप्त अभ्यास (Drill and Practice) कराना चाहिए।
  • पुरस्कार (Rewards): ‘प्रभाव के नियम’ के अनुसार, अच्छा कार्य करने पर बच्चों को शाबाशी या स्टार (Star) दें, ताकि उनका अधिगम सुदृढ़ हो।

D. आलोचनात्मक स्वरूप (Critical Perspective)

  • रटने पर बल (Rote Learning): यह सिद्धांत अभ्यास पर इतना जोर देता है कि यह अक्सर रटंत विद्या (Mechanical repetition) बन जाता है, जहाँ समझ (Understanding) का कोई स्थान नहीं होता।
  • समय की बर्बादी: प्रयास और त्रुटि में सही उत्तर तक पहुँचने में बहुत अधिक समय और ऊर्जा बर्बाद होती है।
  • बुद्धि की उपेक्षा: थार्नडाइक का सिद्धांत मानता है कि सीखना एक अंधी प्रक्रिया (Blind process) है। यह प्रतिभाशाली बच्चों के लिए उपयोगी नहीं है, जो अपनी सूझ-बूझ से समस्या को एक ही बार में हल कर सकते हैं।

4. वोल्फगैंग कोहलर का सूझ या अंतर्दृष्टि का सिद्धांत (Wolfgang Kohler’s Insight Learning)

कोहलर, वर्दीमर और कोफ्का ‘गेस्टाल्टवाद’ (Gestaltism) के प्रवर्तक हैं। गेस्टाल्ट एक जर्मन शब्द है जिसका अर्थ है “समग्र या पूर्ण आकार” (Whole or Total pattern)। गेस्टाल्टवादियों का नारा था: “संपूर्ण, अपने हिस्सों के योग से बड़ा होता है” (The whole is greater than the sum of its parts)।

A. कोहलर के सिद्धांत की रचना (Core Constructs)

कोहलर ने व्यवहारवादियों (पावलव, थार्नडाइक) का कड़ा विरोध किया। उनका मानना था कि सीखना ‘अंधे अभ्यास’ से नहीं, बल्कि सूझ (Insight) या बुद्धि के प्रयोग से अचानक होता है (Ah-ha Moment)।

प्रयोग: कोहलर ने ‘सुल्तान’ नामक एक चिम्पैंजी को कमरे में बंद किया और छत पर केले लटका दिए। कमरे में कुछ बक्से (Boxes) पड़े थे। सुल्तान ने उछलकर केले पकड़ने की कोशिश की, पर असफल रहा। फिर वह शांत बैठ गया और पूरे कमरे (समग्र परिस्थिति) का अवलोकन किया। अचानक उसके दिमाग में सूझ (Insight) आई, उसने बक्सों को एक के ऊपर एक रखा, उस पर चढ़ा और केले प्राप्त कर लिए।

B. अंतर्दृष्टि (Insight) की विशेषताएं

  1. सूझ अचानक (Suddenly) उत्पन्न होती है, धीरे-धीरे नहीं।
  2. सूझ के लिए समस्या का समग्र (Whole) रूप में सामने होना आवश्यक है।
  3. यह रटने पर नहीं, बल्कि संज्ञानात्मक समझ पर आधारित है।

C. कक्षा-कक्ष में व्यावहारिक उपयोग (Educational Implications)

  • पूर्ण से अंश की ओर (Whole to Part Method): शिक्षक को पहले पाठ का पूरा सारांश या रूपरेखा (Overview) प्रस्तुत करनी चाहिए, उसके बाद उसके छोटे-छोटे हिस्सों (Parts) को पढ़ाना चाहिए। (जैसे- पहले पूरा पेड़ दिखाना, फिर उसकी जड़, तने और पत्तियों के बारे में बताना)।
  • समस्या-समाधान विधि (Problem Solving): बच्चों को रटा-रटाया उत्तर देने के बजाय उनके सामने एक समस्या प्रस्तुत करें और उन्हें खुद अपनी सूझ-बूझ से उत्तर खोजने (Heuristic method) के लिए प्रेरित करें।
  • तर्क और कल्पना: यह सिद्धांत गणित, विज्ञान और ज्यामिति (Geometry) जैसे विषयों के लिए अत्यधिक उपयोगी है, जहाँ रटने से काम नहीं चलता।

D. आलोचनात्मक स्वरूप (Critical Perspective)

  • पूर्व अनुभव आवश्यक है: आलोचकों का मानना है कि ‘सूझ’ पूरी तरह से अचानक नहीं आती। सुल्तान चिम्पैंजी को बक्सों के साथ खेलने का पूर्व अनुभव था। यदि किसी बच्चे को जोड़-घटाव (पूर्व ज्ञान) नहीं आता, तो उसे अचानक बीजगणित (Algebra) की सूझ नहीं आ सकती।
  • छोटे और मंदबुद्धि बच्चों के लिए अनुपयुक्त: सूझ के लिए उच्च मानसिक क्षमता की आवश्यकता होती है। यह सिद्धांत छोटे बच्चों (शिशुओं) या मानसिक रूप से कमज़ोर बच्चों पर लागू नहीं किया जा सकता, क्योंकि वे अभ्यास (थार्नडाइक) द्वारा ही सीखते हैं।
  • पशुओं और मनुष्यों में अंतर: चिम्पैंजी में सूझ हो सकती है, लेकिन मानव की समस्या-समाधान क्षमता भाषा और संस्कृति से भी गहराई से जुड़ी होती है, जिसे कोहलर ने स्पष्ट नहीं किया।

5. कक्षा-कक्ष में व्यावहारिक एकीकरण (Synthesis for Teachers)

एक आदर्श MPTET वर्ग 3 शिक्षक के रूप में, आपको किसी एक मनोवैज्ञानिक के सिद्धांत से बंधकर नहीं रहना है, बल्कि आवश्यकतानुसार सबका सम्मिश्रण (Eclectic approach) करना है:

  1. कक्षा अनुशासन और अच्छी आदतों के लिए: पावलव के अनुबंधन (Conditioning) का प्रयोग करें।
  2. पहाड़े (Tables), वर्तनी (Spelling) और हस्तलेखन (Handwriting) सुधारने के लिए: थार्नडाइक के अभ्यास के नियम (Trial and Error) का उपयोग करें।
  3. गणित और विज्ञान के कॉन्सेप्ट समझाने के लिए: कोहलर के ‘पूर्ण से अंश’ (Insight) और पियाजे के ‘मूर्त वस्तुओं के उपयोग’ (Concrete operations) का सहारा लें।
  4. बच्चों को प्रेरित करने के लिए: पाठ शुरू करने से पहले थार्नडाइक के ‘तत्परता के नियम’ को लागू करें।

🌟 MPTET Varg 3 के लिए वन-लाइनर कैप्सूल (Exam Booster) 🌟

  • प्रश्न: “बच्चे ज्ञान का निर्माण स्वयं करते हैं।” यह कथन किसका है?
    • उत्तर: जीन पियाजे (Jean Piaget)।
  • प्रश्न: स्कीमा (Schema) की अवधारणा किसने दी?
    • उत्तर: जीन पियाजे ने।
  • प्रश्न: ‘अनुबंधन का जनक’ (Father of Conditioning) किसे कहा जाता है?
    • उत्तर: इवान पावलव (Ivan Pavlov) को।
  • प्रश्न: थार्नडाइक के अनुसार सीखने के मुख्य नियम कितने हैं?
    • उत्तर: तीन (तत्परता, अभ्यास, और प्रभाव)।
  • प्रश्न: गेस्टाल्टवाद का मुख्य अर्थ क्या है?
    • उत्तर: समग्र या पूर्ण आकार (Whole)।
  • प्रश्न: कोहलर ने अपने सूझ के सिद्धांत का प्रयोग किस पर किया था?
    • उत्तर: ‘सुल्तान’ नामक चिम्पैंजी (वनमानुष) पर।
  • प्रश्न: जब पुरानी जानकारी में बिना किसी बदलाव के नई जानकारी जोड़ ली जाती है, तो उसे क्या कहते हैं?
    • उत्तर: समावेशन / आत्मसातीकरण (Assimilation)।
  • प्रश्न: ‘पूर्ण से अंश की ओर’ (Whole to Part) शिक्षण सूत्र किस सिद्धांत पर आधारित है?
    • उत्तर: कोहलर के अंतर्दृष्टि (Insight) सिद्धांत पर।

❓ FAQ: परीक्षा उपयोगी बहुविकल्पीय प्रश्न (Example MCQs for MPTET)

इन प्रश्नों के माध्यम से अपनी तैयारी का स्व-मूल्यांकन करें:

प्रश्न 1: एक 8 वर्ष का बच्चा यह समझने लगता है कि यदि पानी को बर्फ में बदला जाए और फिर बर्फ को पिघलाया जाए, तो वह वापस पानी बन जाता है। पियाजे के अनुसार यह कौन सी अवस्था है?
(A) संवेदी-गामक अवस्था
(B) पूर्व-संक्रियात्मक अवस्था
(C) मूर्त संक्रियात्मक अवस्था
(D) अमूर्त संक्रियात्मक अवस्था
उत्तर: (C)
व्याख्या: बच्चा ‘पलटावी’ (Reversibility) का गुण सीख गया है। यह 7 से 11 वर्ष (मूर्त संक्रियात्मक अवस्था) की मुख्य विशेषता है।

प्रश्न 2: एक शिक्षिका अपनी कक्षा में बच्चों को कोई नया विषय पढ़ाने से पहले एक कहानी सुनाती है ताकि बच्चों की रुचि जाग्रत हो। वह थार्नडाइक के किस नियम का पालन कर रही है?
(A) अभ्यास का नियम
(B) तत्परता का नियम
(C) प्रभाव का नियम
(D) आंशिक क्रिया का नियम
उत्तर: (B)
व्याख्या: कहानी सुनाकर शिक्षिका बच्चों को मानसिक रूप से सीखने के लिए ‘तैयार’ (Ready) कर रही है। यह तत्परता (Readiness) का नियम है।

प्रश्न 3: इवान पावलव के शास्त्रीय अनुबंधन प्रयोग में, ‘घंटी की आवाज़’ क्या थी?
(A) स्वाभाविक उद्दीपक (UCS)
(B) स्वाभाविक अनुक्रिया (UCR)
(C) अस्वाभाविक / कृत्रिम उद्दीपक (CS)
(D) अनुबंधित अनुक्रिया (CR)
उत्तर: (C)
व्याख्या: घंटी एक कृत्रिम (Conditioned) उद्दीपक है, जिसे स्वाभाविक उद्दीपक (भोजन) के साथ जोड़ा गया था।

प्रश्न 4: पियाजे के सिद्धांत की आलोचना मुख्य रूप से किस मनोवैज्ञानिक ने इस आधार पर की कि “उन्होंने संज्ञानात्मक विकास में सामाजिक-सांस्कृतिक कारकों और भाषा को नजरअंदाज किया”?
(A) बी. एफ. स्किनर
(B) लेव वाइगोत्स्की
(C) अल्बर्ट बंडूरा
(D) हावर्ड गार्डनर
उत्तर: (B)
व्याख्या: वाइगोत्स्की का मानना था कि विकास समाज और संस्कृति (Social interaction) के बिना संभव नहीं है, जबकि पियाजे ने इसे व्यक्तिगत (जैविक परिपक्वता) माना था।

प्रश्न 5: एक गणित का शिक्षक बच्चों को सीधे फॉर्मूला बताने के बजाय, बोर्ड पर एक समस्या लिखता है और बच्चों को स्वयं विभिन्न तरीकों से उत्तर तक पहुँचने के लिए प्रोत्साहित करता है। शिक्षक किस सिद्धांत का प्रयोग कर रहा है?
(A) पावलव का अनुबंधन
(B) थार्नडाइक का प्रयास एवं त्रुटि
(C) कोहलर का अंतर्दृष्टि (सूझ) सिद्धांत
(D) स्किनर का क्रिया-प्रसूत अनुबंधन
उत्तर: (C)
व्याख्या: यहाँ शिक्षक बच्चों की ‘सूझ’ (Insight) और मानसिक क्षमता को विकसित कर रहा है। रटा-रटाया ज्ञान (फॉर्मूला) देने के बजाय, वह समग्र परिस्थिति को समझने (Gestalt) पर बल दे रहा है।

प्रश्न 6: “एक बच्चा जिसने लाल रंग का जलता हुआ कोयला छू लिया था और उसका हाथ जल गया था। अब वह लाल रंग के टमाटर या लाल गेंद को देखकर भी डर जाता है।” यह किस सिद्धांत को दर्शाता है?
(A) अंतर्दृष्टि
(B) शास्त्रीय अनुबंधन (Classical Conditioning)
(C) मूर्त चिंतन
(D) प्रभाव का नियम
उत्तर: (B)
व्याख्या: बच्चे ने ‘लाल रंग’ (कृत्रिम उद्दीपक) को ‘जलने के दर्द’ (स्वाभाविक उद्दीपक) के साथ अनुबंधित (Conditioned) कर लिया है। इसे उद्दीपक का सामान्यीकरण (Stimulus Generalization) भी कहते हैं।

अंतिम संदेश:

प्रिय अभ्यर्थियों, मनोविज्ञान के ये सिद्धांत केवल परीक्षा पास करने के लिए नहीं हैं। जब आप एक शिक्षक के रूप में कक्षा में प्रवेश करेंगे, तो पियाजे आपको बच्चों की सोच समझने में, पावलव अनुशासन बनाने में, थार्नडाइक अभ्यास कराने में, और कोहलर बच्चों में तार्किक क्षमता (Insight) जगाने में मदद करेंगे। इन सिद्धांतों की रचना और इनकी कमियों (आलोचना) दोनों को गहराई से समझें। आपकी सफलता सुनिश्चित है!

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